देश भर में पिछले कुछ समय से स्लीपर बसों में आग लगने की बढ़ती घटनाओं और उनमें होने वाली जनहानि को देखते हुए भारत सरकार के परिवहन मंत्रालय ने बस निर्माण के नियमों में आमूलचूल बदलाव करने का निर्णय लिया है। हाल ही में हैदराबाद, कुरनूल और जैसलमेर जैसे शहरों में हुए भीषण हादसों ने बस डिजाइन की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए थे, जिसके बाद सरकार ने अब ‘चलता-फिरता ताबूत’ बन चुकी असुरक्षित बसों पर लगाम लगाने के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन नए नियमों का मुख्य उद्देश्य यात्रियों को आग जैसी आपातकालीन स्थितियों में सुरक्षित बाहर निकलने का मौका देना और बसों में घटिया निर्माण सामग्री के इस्तेमाल को रोकना है।
परिवहन मंत्रालय ने अब स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में कोई भी बस ऑपरेटर स्थानीय गैरेज या अनधिकृत मैकेनिकों से बस की बॉडी तैयार नहीं करवा सकेगा। अब तक यह देखा जाता था कि बस मालिक लागत कम करने के चक्कर में कंपनी से केवल चेसिस खरीदते थे और ऊपर का ढांचा स्थानीय स्तर पर बनवाते थे, जहाँ सुरक्षा मानकों की पूरी तरह अनदेखी की जाती थी। अब केवल सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कंपनियाँ या टाटा, अशोक लीलैंड और वोल्वो जैसे प्रमाणित निर्माता ही बसों की बॉडी बना सकेंगे। 1 जून के बाद से बिना एआईएस (AIS 052) सर्टिफिकेट वाली किसी भी नई बस का पंजीकरण नहीं किया जाएगा, जिससे सड़क पर केवल मानक स्तर की बसें ही उतर सकेंगी।













